Thursday, 31 July 2014

डर

आज गर्मी का उमस भरा मौसम , मुझे मेरे बचपन में खींच ले जाता  है !
जब मैं छोटी थी गर्मी में जमीन पर लेट जाती थी बिना  डर के की कोई कीड़ा आ जायेगा या छिपकली आ जाएगी और जमीन की उस ठण्ड में जो नींद आती थी वो आज कूलर या ए.सी. के सामने  नहीं आती और आज का आलम ये है की बिना चप्पल के सिर्फ बेड पर नजर आते हैं हम लोग ।
    इसका रीजन ये नहीं है की हम लोग बड़े  हैं, इसका रीजन ये है की हम डरने लगे हैं।
हम सब को डर का मतलब पता है , फिर चाहे वो कीड़ा हो या लोग। 

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